‘इकोनॉमिक फ्यूरी’ के जरिए ईरान पर दबाव बढ़ाएगा अमेरिका, प्रतिबंधों के संकेत
वॉशिंगटन | पश्चिम एशिया में तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक महीने से ज्यादा चले भीषण सैन्य टकराव के बाद भले ही अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम हुआ हो, लेकिन जंग अब नए मोर्चे पर पहुंच गई है। गोलियों और मिसाइलों की जगह अब आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल तेज हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान की कमर तोड़ने के लिए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की नई रणनीति तैयार कर ली है। ईरान के तेल कारोबार से लेकर वैश्विक बैंकिंग नेटवर्क तक, हर रास्ता बंद करने की कोशिश की जा रही है, जिससे ईरान पर चौतरफा दबाव बनाया जा सके।बढ़ते इस तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप की प्रशासन ने अपना रुख साफ किया है कि वह ईरान पर और सख्त प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। इसमें उन देशों और बैंकों पर भी कार्रवाई शामिल हो सकती है, जो ईरान के तेल कारोबार से जुड़े हैं। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह कदम ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी के तहत उठाया जा रहा है। उनका कहना है कि पिछले एक साल से ईरान पर मैक्सिमम प्रेशर यानी अधिकतम दबाव बनाया जा रहा है।
समझिए क्या है नई रणनीति?
इस बात को ऐसे समझिए कि अमेरिका अब उन देशों से भी सख्त कदम उठाने को कह रहा है, जिनके पास ईरान से जुड़े पैसे हैं। खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और ईरानी नेतृत्व से जुड़े फंड को फ्रीज करने की मांग की जा रही है। ऐसे में अमेरिका ने साफ चेतावनी दी है कि अगर कोई देश ईरानी तेल खरीदता है या उसके पैसे अपने बैंकों में रखता है, तो उस पर सेकेंडरी सैंक्शन यानी अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
चीन के बैंकों को चेतावनी भी दी
इसके इतर अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने बताया कि चीन के कुछ बैंकों को पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है। अगर उनके जरिए ईरान के पैसे का लेन-देन पाया गया, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी। अमेरिका ने यह भी कहा है कि वह ईरान के तेल से जुड़ी सामान्य छूट (लाइसेंस) को आगे नहीं बढ़ाएगा। इसका मतलब है कि ईरान के लिए तेल बेचकर कमाई करना और मुश्किल हो जाएगा।
क्षेत्रीय हालात का असर
गौतरलब है कि अमेरिका का कहना है कि हाल ही में ईरान की कुछ गतिविधियों, खासकर पड़ोसी खाड़ी देशों के साथ तनाव, की वजह से अब कई देश भी सतर्क हो गए हैं और पैसे के लेन-देन पर ज्यादा नजर रख रहे हैं।व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ये कदम अमेरिका के लंबे समय के सुरक्षा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उठाए जा रहे हैं।

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